धर्म और धर्म की अनावश्यकता

धर्म और धर्म की अनावश्यकता

मानव इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है जब एक धर्म के समूह ने किसी अन्य धर्म समूह के लोगों की रक्षा इस भावना के तहत की हो कि "धर्म आपस में सौहार्द कायम करता है", जबकि दुनिया का इतिहास भिन्न धार्मिक समूहों के बीच सिर्फ धार्मिक पहचान के लिए ही औपचारिक और अनौपचारिक(दंगा, आतंकवाद) युद्धों से भड़ा पड़ा है। धर्म के आधार पर भिन्न भिन्न धार्मिक समूहों के बीच कभी भी सौहार्द का नहीं होना और धार्मिक भेद के आधार पर ढेरों लड़ाइयों,दंगों और आतंकवाद का होना इस बात के लिए प्रेरित करता है कि यदि कोई देश, विशेषकर बहुधार्मिक देश प्रगति करना चाहता है, अपने लोगों के बीच एका चाहता है तो उसे धर्म को छोड़कर कोई अन्य आधार, जो निशिचित ही सेक्युलर होगा के आधार पर राजनीति और शासन नीति बनानी चाहिए। 
   अब अगर इतनी सी बात भी नहीं समझनी हो तो भाड़ में जाइये।
          क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि
    महाभारत का युद्ध जिसके समर्थक धर्म रक्षा का युद्ध बताते थे उस युद्ध में बड़े बड़े धार्मिक लोग उस पक्ष की ओर थे जिसपर धर्म भंग करने का आरोप था और दूसरी बात कि धर्म की रक्षा की बात पूरी तरह से सेक्युलर मुद्दों यानी जमीन पर मिल्कियत, राजगद्दी पर अधिकार को लेकर थी न कि किसी काफिर के खिलाफ। एक बार महाभारत को बिना हिन्दू या कोई धार्मिक अन्य पहचान ओढ़े पढिये तो साफ पता चलता है कि उस काल का समाज धर्म उसी को मानता था जो उस समय के सनुसार समाज और देश संचालन के लिए जरूरी था, जैसे संतानविहीन स्त्री का अन्य पुरुष के साथ सन्तान हेतु सहवास, और विधर्मी का साथ देने वाले ब्राह्मण की हत्या को भी जायज और धर्म अनुरूप आचरण माना गया। सो आज धर्म और धार्मिक पहचान पर खुलकर बात करनी चाहिए ताकि यह दिखा सकें कि धर्म न तो सनातन है न शाश्वत है।
         उपरोक्त दोनों चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि धर्म न तो मोक्ष के लिए और न ही अगले जन्म में पुण्यात्मा ब्राह्मण के रूप में जन्म लेने के लिए प्रयुक्त होता है बल्कि इसका सीधा उपयोग सेक्युलर संसाधनों पर कब्जे के लिए होता है और ऐसे ही होते आया है फिर चाहे वो राम का धर्म हो, कृष्ण का धर्म हो या शिव का या विष्णु का या काली का या मोहम्मद साहब का या ईसा का या बुद्ध का या कोई और। और यदि सेक्युलर मामलों का निपटारा सेक्युलर माध्यमो से हो तो बेहतर हो। धर्म सेक्युलर मामलों का पंच तब होता था जब धर्म ही दर्शन और विज्ञान की धरोहर माना जाता था। आज मानव विकास के क्रम में दर्शन और विज्ञान दोनों धर्म से खुद को स्वतंत्र कर सेक्युलर विषयों के रूप में अधिष्ठापित कर चुके हैं तो धर्म की आवश्यकता दर्शन और विज्ञान के रूप में समाप्त हो जानी चाहिए। और नैतिकता धर्म की अमानत नहीं है बल्कि दर्शन, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र धर्म की नैतिकता को बिना पूर्वजन्म की कल्पना के भी बेहतर ढंग से समझाने में सक्षम हैं।

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