नैतिकता निरन्तर परिवर्तनशील है

नैतिकता निरन्तर परिवर्तनशील है

सामाज के बृहत्तर कैनवास पर नैतिकता का प्रश्न बहुत ही जटिल होता है। जो नियम व्यक्ति के स्तर पर नैतिक कहे जाते हैं उनको उसी रूप में समाज के स्तर पर निरूपित करना असंभव हो जाता है। इंसान के इतिहास में ऐसा कोई समाज आज तक नहीं हो सका है जो समाज द्वारा नियत किये गए नैतिकता के नियमों और उसके मापदंडों का पालन करता हो। तो प्रश्न उठता है कि क्या नैतिकता का प्रश्न और उसपर होने वाले बहस वास्तव में निरर्थक होते हैं?
      कदापि नहीं। इस सत्य को तो स्विकार किया ही जाना चाहिए कि समाज के स्तर पर नैतिकता का निर्वहन नही  होता है लेकिन इससे नैतिकता का विषय गौण नहीं हो जाता है। समाज व्यक्तियों से बनता है और यदि अधिसंख्य व्यक्तियों में सामाजिक नैतिकता के मूल्य गहरे होते हैं तो वह समाज अपने अंदर उठने वाले अनैतिक विचारों और प्रवृत्तियों पर सफलता पूर्वक नकेल कस पाता है और समाज समग्र रूप से मजबूत होकर उभरता है।
     अब एक दूसरा प्रश्न उठता है , जो मूल प्रश्न है कि समाज के किस नियम को नैतिक मूल्यों का सम्वर्द्धन माना जाए और किसे नहीं। इस प्रश्न का उत्तर व्यक्तियों के समाज के इतिहास में छुपा है। अपने प्रादुर्भाव काल से समाज अपने सफल संचालन के लिए नियमों और मूल्यों को गढ़ते रहा है जो समाज के आर्थिक गतिविधोयों के इर्द गिर्द घूमते रहें हैं। चूँकि समाज निरन्तर परिवर्तनशील है, और तकनीक और तकनीक के कारण आर्थिक गतिविधियों में निरन्तर परिवर्तन होते रहा है सो समाज के नियमो  और मूल्यों में भी निरन्तर परिवर्तन होते रहा है। ऐसी स्थिति में  जो पुरातन है वह आज भी प्रासंगिक होगा ही यह तय नहीं है। पुरातन काल में जो दर्शन और विज्ञान की सबसे पहली धाराओं को मनुष्यों ने खोजा या बनाया उनमें धर्म भी एक था। लेकिन धर्म को चिरस्थाई स्वरूप उनके नैतिक संदेशों ने दिया और अपने उन्ही  नैतिक सन्देशों के कारण धर्म प्रचलित बने रहे।लेकिन जैसे जैसे  व्यक्ति का सफर बढ़ता गया दर्शन और ज्ञान जटिल होते गए,और धर्म के साथ साथ विज्ञान भी हाथ पांव पसारने लगा जिसकी अपनी जरूरतें भिन्न थी वैसे वैसे इस कारण से विज्ञान ने अपनी सुविधा के लिए नैतिक मूल्यों की नई श्रृंखला भी तैयार की और समय के साथ उनमें परिवर्तन, सम्वर्द्धन और विलोपन भी किया। इसे हम बहुत सामान्य उदाहरण से समझ सकते हैं। पशुपालक और कृषि आधारित समाज में भारत में जातियो को लेकर जो नैतिक मूल्य बनाये गए वे व्यापार और औद्योगिक अर्थव्यस्था वाले समाज के लिए अप्रासंगिक हो गए। लेकिन यदि नैतिकता के नाम पर हम जातियों के लिए पुरातन काल में गढ़े गए नियमो पर टिके रहे तो फिर आधुनिक औद्योगिक समाज का चलना भी सम्भव नहीं हो पायेगा। इसी प्रकार इतिहास हमें यह भी बतलाता है कि यदि अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने के लिए गृहयुद्ध नहीं लड़ा जाता तो अमेरिका आज भी एक पिछड़ा कृषि प्रधान देश ही बना रहता। 
    ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि व्यक्ति के स्तर पर मानी जाने वाली नैतिकता के मूल्यों को समाज सभ्यता के तकनीक और आर्थिक उद्यमिता के दौर के अनुसार परिवर्तित, संवर्धित और विलोपित करे। तभी व्यक्तियों के स्तर पर नैतिकता की स्वीकार्यता बढ़ेगी जिसका प्रत्यक्ष लाभ समाज को सामाजिक नैतिकता के मजबूत होने के रूप में प्राप्त होगा।

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