भारत को समर्पित उसकी "ट्रिस्ट विद द डेस्टिनी"

भारत को समर्पित उसकी "ट्रिस्ट विद द डेस्टिनी"

आजादी के 75वें साल में आज हमारे पास वो पीढ़ी नहीं बची है जिसने गाँधी और नेहरू के युग के संघर्ष  को और उस दौर के भारत की दुर्दशा को देखा हो जिसमें उस  दुर्दशा से दो दो हाथ करने वाले लोग हुआ करते थे। दुनिया के महान देश वे होते हैं जो अपने कठिनतम वक़्त की और उस वक़्त के महानायकों की स्मृतियों को इतिहास बनाकर सुरक्षित ही नहीं रखते हैं बल्कि उस वक़्त के इतिहास को  और उन महानायकों के कृतित्व और जीवन दर्शन को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते भी हैं। आज के दौर के सबसे शक्तिशाली देश जो  संयोग से आधुनिक  दुनिया का प्राचीनतम लोकतंत्र भी कहलाता है उस अमेरिका में आज चाहे जो बदल गया हो लेकिन जो एक चीज नहीं बदली है वह है अमेरकियों का अपने फाउंडिंग फादर्स के प्रति विश्वास और उनके प्रति श्रद्धा। महान बनने की पहली शर्त ही है कि आप अपनी जड़ों को मजबूत रखें। लेकिन दुनिया में एक घड़ा और भी है जिसे हर उस चीज से नफरत है जो स्वतन्त्रता, सम्मान, सहभागिता, न्याय,  और मानवीय मूल्यों में अगाध श्रद्धा को घृणित मानती है और जो नस्लीय भेदभाव, धार्मिक भेदभाव, जातीय भेदभाव , लैंगिक भेदभाव पर टिकी होती है। आधुनिक दुनिया में यह घड़ा कभी तथाकथित साम्यवाद के वाहक स्तालिन और माओ के रूप में , कभी जिंग पिंग और पुतिन के रुप में ,कभी नाजीवादी फासीवादी मुसोलिनी और हिटलर के रूप में सामने आता रहता है। ये लोग भी महानता का दम्भ भरते हैं लेकिन उनके महान बनने की शर्त होती है कि उनके वफादारों को छोड़कर दूसरे सभी नीच हैं, गद्दार हैं और इन नीच और गद्दार  लोगों को दुनिया में रहने का अधिकार नहीं है। वे  शुद्धिकरण करना चाहते हैं अपने देश, समाज और दुनिया का। हिटलर की यहूदियों के विरुद्ध चलाए गए अभियान, चीनी नेताओँ की सांस्कृतिक क्रांति और ग्रेट लीप, और उनकी लोकतंत्र विरोधी हिंसाएं, जो रोजमर्रा की जिंदगी से तियानमेन चौक से होते हुए हांगकांग तक जा चुकी है, स्तालिन की ट्राटस्की समर्थकों और लेनिन समर्थकों से शत्रुता का अभियान, पुतिन का लोकतंत्र समर्थकों के खिलाफ अभियान ये सभी घृणा , द्वेष और झूठी मान्यताओं के आधार पर चलाये गए अभियान रहें हैं जिनका उद्देश्य रहा है खुद को महान कहलवाने के लिए अन्य लोगों की निर्मम विदाई करना। आज की दुनिया में भी यह घड़ा कई देशों में उन देशों की सभ्यताओं से अपने अपने ढंग से बदला ले रहा है, फिर चाहे जिंग पिंग की डेंग और माओ को पछड़ने की  जिद्द हो या पुतिन के द्वारा गोरवाचोव के बाद बने रूस को उसके लोकतंत्र से मरहूम करने के लिए साम्राज्यवादी सोवियत अतीत को जीवित करने की जिद्द हो, ये सभी उसी सनकी महानता के  परिचायक हैं। भारत में जो आज घट रहा है और भारत के स्वर्णिम स्वतंत्रता संग्राम और उसके अद्भुत नायको की स्मृतियों  के साथ आज के शीर्ष नेतृत्व द्वारा जो किया जा रहा है वह भी इसी कड़ी में है। जिन लोगों ने गाँधी , नेहरू, बोस और भगत सिंह के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों से मुँह मोड़ा वही आज यह दिखाने की कोशिश कर रहें हैं कि आजादी( जिसे कुछ लोग अपनी रौ में आझादी कह रहे हैं) के संघर्ष में फलाना थे, फलाना नहीं थे। यह एक भद्दा  ऐतिहासिक सभ्यता स्तरीय असभ्यता ही है कि भारत की आज की पीढ़ी और आज की पीढ़ी के उसके नेता न तो आजादी के संघर्ष के दौर से वाकिफ हैं , न हीं उस दौर के भारतीयों की पीड़ा और उनके बलिदान से वाकिफ हैं , न हीं उस दौर के नेताओं की खूबियों को जानते हैं और न ही आधुनिक भारत के फाउंडिंग फादर्स के प्रति उनके मन में कोई श्रद्धा ही है। अपने ही इतिहास और इतिहास पुरुषों से गद्दारी करती आज की पीढ़ी न कभी महान बन सकती है और न ही भारत माता को उसकी वो महानता दे सकती है जो उसके हिस्से उसके इतिहास पुरुषों ने देने का वादा किया था, और जिसे पण्डित नेहरू ने "ट्रिस्ट विथ द डेस्टिनी" का नाम दिया था।
    जय हिंद!!

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